श्री दुर्गा कवच: संपूर्ण पाठ, महत्त्व एवं पाठ विधि

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श्री दुर्गा कवच

श्री दुर्गा कवच: संपूर्ण पाठ, महत्त्व, एवं पाठ-विधि

माँ दुर्गा की उपासना में श्री दुर्गा कवच का अत्यन्त महत्त्व माना गया है। यह दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) का एक प्रमुख अंग है। परम्परानुसार सप्तशती के मुख्य पाठ से पूर्व देवी कवच, अर्गला स्तोत्र तथा कीलक स्तोत्र का पाठ किया जाता है। श्री दुर्गा कवच में माता के विविध स्वरूपों का स्मरण करते हुए सम्पूर्ण शरीर, मन, प्राण तथा जीवन की रक्षा की प्रार्थना की जाती है।

यह कवच महर्षि मार्कण्डेय और ब्रह्माजी के संवाद के रूप में प्रस्तुत है। इसमें ब्रह्माजी महर्षि मार्कण्डेय को देवी का ऐसा दिव्य कवच बताते हैं जिसे श्रद्धापूर्वक पढ़ने वाला साधक माता भगवती की कृपा एवं संरक्षण प्राप्त करता है।

श्री दुर्गा कवच क्या है?

‘कवच’ का सामान्य अर्थ है रक्षा करने वाला आवरण। जैसे योद्धा युद्ध में कवच धारण करता है, उसी प्रकार यह स्तोत्र साधक के लिए आध्यात्मिक संरक्षण का प्रतीक माना गया है।

इसमें माता दुर्गा के अनेक स्वरूपों का आवाहन कर जीवन की प्रत्येक दिशा, प्रत्येक अंग तथा प्रत्येक परिस्थिति में उनकी कृपा और रक्षा की प्रार्थना की गई है। यही कारण है कि इसे देवी कवच भी कहा जाता है।

श्री दुर्गा कवच का महत्त्व

श्री दुर्गा कवच केवल शारीरिक सुरक्षा का ही प्रतीक नहीं है। इसका व्यापक भाव यह है कि साधक का तन, मन, बुद्धि, प्राण, धर्म, यश, परिवार तथा जीवन-पथ सभी देवी की कृपा से सुरक्षित रहें।

इस स्तोत्र में नवदुर्गा का स्मरण, मातृशक्तियों का वर्णन तथा शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा के लिए देवी के विभिन्न स्वरूपों का आवाहन किया गया है। इसी कारण यह स्तोत्र शक्ति-उपासना में अत्यन्त पूजनीय माना जाता है।

श्री दुर्गा कवच का संक्षिप्त भावार्थ

श्री दुर्गा कवच का आरम्भ महर्षि मार्कण्डेय द्वारा ब्रह्माजी से एक ऐसे परम रहस्य के विषय में प्रश्न करने से होता है जो मनुष्यों की सर्वत्र रक्षा करता है।

ब्रह्माजी उत्तर देते हैं कि देवी का यह कवच अत्यन्त पवित्र तथा लोककल्याणकारी है। इसके पश्चात् नवदुर्गा के नौ स्वरूपों का वर्णन किया गया है—

  • शैलपुत्री
  • ब्रह्मचारिणी
  • चन्द्रघण्टा
  • कूष्माण्डा
  • स्कन्दमाता
  • कात्यायनी
  • कालरात्रि
  • महागौरी
  • सिद्धिदात्री

इसके आगे देवी के विविध स्वरूपों से शरीर के प्रत्येक अंग, सभी दिशाओं, इन्द्रियों, मन, बुद्धि, प्राण तथा सम्पूर्ण जीवन की रक्षा की प्रार्थना की गई है।

अन्तिम श्लोकों में श्रद्धापूर्वक पाठ करने वाले साधक के लिए देवी की कृपा, निर्भयता, आरोग्य, यश, दीर्घायु तथा आध्यात्मिक कल्याण का वर्णन मिलता है।

श्री दुर्गा कवच का पाठ कब करना चाहिए?

  • प्रतिदिन प्रातः अथवा सायंकाल
  • शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि में
  • दुर्गा सप्तशती के पाठ से पूर्व
  • देवी उपासना के समय
  • विशेष साधना अथवा शक्ति-पूजन के अवसर पर

श्री दुर्गा कवच के पाठ की सामान्य विधि

स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

माँ दुर्गा का ध्यान करें तथा श्रद्धापूर्वक दीप और नैवेद्य अर्पित करें।

इसके पश्चात् शुद्ध मन से श्री दुर्गा कवच का पाठ करें।

यदि दुर्गा सप्तशती का सम्पूर्ण पाठ किया जा रहा हो, तो परम्परानुसार पहले देवी कवच, फिर अर्गला स्तोत्र और उसके बाद कीलक स्तोत्र का पाठ किया जाता है।

श्री दुर्गा कवच से मिलने वाली आध्यात्मिक प्रेरणा

इस स्तोत्र का मूल संदेश यह है कि साधक अपने जीवन का प्रत्येक कार्य देवी की शरण में रहकर करे।

यह हमें स्मरण कराता है कि बाह्य शक्ति के साथ-साथ आन्तरिक धैर्य, सद्बुद्धि, संयम, श्रद्धा तथा धर्मपालन भी जीवन के वास्तविक संरक्षण का आधार हैं।

श्री दुर्गा कवच (संपूर्ण पाठ)

॥ अथ श्री देव्याः कवचम् ॥

ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्यब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
चामुण्डा देवता, अङ्गन्यासोक्तमातरोबीजम्, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्,
श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेनजपे विनियोगः।

ॐ नमश्चण्डिकायै॥

मार्कण्डेय उवाच

ॐ यद्गुह्यं परमं लोकेसर्वरक्षाकरं नृणाम्।
यन्न कस्यचिदाख्यातंतन्मे ब्रूहि पितामह॥1॥

ब्रह्मोवाच

अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥2॥

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥3॥

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥4॥

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥5॥

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥6॥

न तेषां जायते किञ्चिदशुभं रणसङ्कटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥7॥

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥8॥

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारुढा वैष्णवी गरुडासना॥9॥

माहेश्वरी वृषारुढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥10॥

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारुढा सर्वाभरणभूषिता॥11॥

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥12॥

दृश्यन्ते रथमारुढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥13॥

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥14॥

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥15॥

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥16॥

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥17॥

दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥18॥

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥19॥

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥20॥

अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥21॥

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥22॥

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शाङ्करी॥23॥

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥24॥

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥25॥

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥26॥

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खङ्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी॥27॥

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥28॥

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥29॥

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥30॥

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥31॥

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥32॥

नखान् दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥33॥

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥34॥

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु॥35॥

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहङ्कारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥36॥

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥37॥

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥38॥

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥39॥

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥40॥

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥41॥

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥42॥

पदमेकं न गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥43॥

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥44॥

निर्भयो जायते मर्त्यः सङ्ग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥45॥

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥46॥

दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥47॥

नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥48॥

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥49॥

सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥50॥

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥51॥

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्॥52॥

यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥53॥

यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥54॥

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥55॥

लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥56॥

॥ इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम् ॥

FAQ

1. श्री दुर्गा कवच किस ग्रन्थ का अंग है?

श्री दुर्गा कवच दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य) का एक महत्त्वपूर्ण अंग है, जिसका उल्लेख मार्कण्डेय पुराण में मिलता है।

2. क्या श्री दुर्गा कवच का पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है?

हाँ। श्रद्धा एवं शुद्ध भाव से इसका प्रतिदिन पाठ किया जा सकता है।

3. क्या दुर्गा सप्तशती से पहले श्री दुर्गा कवच का पाठ किया जाता है?

हाँ। परम्परा के अनुसार पहले देवी कवच, फिर अर्गला स्तोत्र, उसके बाद कीलक स्तोत्र और अन्त में दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है।

4. श्री दुर्गा कवच का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इसका मुख्य उद्देश्य देवी की शरण ग्रहण कर सम्पूर्ण जीवन के लिए आध्यात्मिक संरक्षण, साहस, श्रद्धा तथा मंगल की प्रार्थना करना है।

RN Tripathy

लेखक परिचय – [रुद्रनारायण त्रिपाठी] मैं एक संस्कृत प्रेमी और भक्तिपूर्ण लेखन में रुचि रखने वाला ब्लॉग लेखक हूँ। AdyaSanskrit.com के माध्यम से मैं संस्कृत भाषा, न्याय दर्शन, भक्ति, पुराण, वेद, उपनिषद और भारतीय परंपराओं से जुड़े विषयों पर लेख साझा करता हूँ, ताकि लोग हमारे प्राचीन ज्ञान और संस्कृति से प्रेरणा ले सकें।

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