Navratri 2026 : में कलश स्थापना कैसे करें? संपूर्ण विधि और नियम

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Navratri में कलश स्थापना कैसे करें? संपूर्ण विधि

नवरात्रि में कलश स्थापना कैसे करें? संपूर्ण विधि

नवरात्रि का आरंभ माँ दुर्गा के आवाहन से होता है। यह आवाहन कलश स्थापना के साथ पूर्ण माना जाता है।

प्रतिपदा के दिन घर के पूजा-स्थान में कलश की स्थापना होती है। मान्यता है कि इसी कलश में नौ दिन तक माँ शक्ति का वास रहता है।

अनेक श्रद्धालुओं के मन में प्रश्न रहता है कि नवरात्रि में कलश स्थापना कैसे करें, कौन-सी सामग्री लगेगी और पूजन किस क्रम से होगा। आगे कलश स्थापना की संपूर्ण विधि सरल भाषा में क्रमवार दी गई है।

नवरात्रि में कलश स्थापना का महत्व

कलश को घट भी कहा जाता है। इसीलिए इस पूजन को घटस्थापना कहते हैं।

शास्त्रीय मान्यता है कि कलश के मुख में भगवान विष्णु, कंठ में रुद्र और मूल में ब्रह्मा का वास होता है। कलश के मध्य भाग में मातृशक्तियाँ विराजमान मानी जाती हैं।

कलश में जल भरकर पवित्र नदियों और तीर्थों का आवाहन किया जाता है। इसी कारण कलश को मंगल, पूर्णता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है।

शारदीय नवरात्रि कलश स्थापना आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को की जाती है। चैत्र नवरात्रि में यही पूजन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को होता है। दोनों में विधि एक-सी रहती है।

कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त प्रतिपदा तिथि में प्रातःकाल माना जाता है। इस समय पूजन करना सर्वोत्तम है।

शास्त्रीय मान्यता के अनुसार प्रतिपदा में चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग हो, तो उस अवधि में स्थापना वर्जित मानी गई है। ऐसी स्थिति में अभिजित मुहूर्त में कलश स्थापित किया जाता है।

रात्रि में कलश स्थापना नहीं की जाती।

पंचांग में समय का निर्धारण स्थान के अनुसार भिन्न होता है। इसलिए अपने नगर का पंचांग देखें अथवा किसी योग्य पंडित से परामर्श लें।

कलश स्थापना सामग्री

पूजा आरंभ करने से पहले समस्त सामग्री एक स्थान पर रख लें। इससे पूजन के मध्य उठना नहीं पड़ता।

  • जौ बोने के लिए मिट्टी का चौड़े मुख वाला पात्र
  • स्वच्छ मिट्टी
  • जौ (अथवा सप्तधान्य)
  • मिट्टी, तांबे, पीतल, चाँदी या स्वर्ण का कलश
  • स्वच्छ जल तथा गंगाजल
  • मौली (कलावा)
  • रोली, हल्दी और कुमकुम
  • अक्षत
  • सुपारी तथा एक मुद्रा
  • दूर्वा
  • आम के पाँच या सात पल्लव
  • कलश का ढक्कन अथवा मिट्टी का छोटा पात्र
  • जटा वाला नारियल
  • लाल वस्त्र अथवा चुनरी
  • पुष्प तथा पुष्पमाला
  • धूप, दीपक, कपूर, घी अथवा तेल और बाती
  • फल तथा नैवेद्य
  • चौकी, आसन तथा माँ दुर्गा की प्रतिमा अथवा चित्र
  • पंचरत्न और सर्वौषधि (जिनकी परंपरा में इनका विधान हो)

नवरात्रि में कलश स्थापना कैसे करें: संपूर्ण विधि

घटस्थापना विधि के चरण नीचे क्रम से दिए गए हैं। यदि आपके कुल की परंपरा में कुछ भिन्नता हो, तो उसका भी सम्मान करें।

1. स्नान और स्थान की स्वच्छता

प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। लाल अथवा पीले वस्त्र उत्तम माने जाते हैं।

पूजा-स्थान को स्वच्छ करें और वहाँ गंगाजल छिड़कें।

2. चौकी की स्थापना

ईशान कोण में चौकी रखें और उस पर लाल वस्त्र बिछाएँ। चौकी पर माँ दुर्गा की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें।

पूजन करते समय साधक का मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर रहे।

3. संकल्प

दाहिने हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र और स्थान बोलते हुए नवरात्रि पूजन का संकल्प करें।

संकल्प का मंत्र अपने कुलपुरोहित से पूछकर बोलें। यदि यह संभव न हो, तो श्रद्धापूर्वक अपनी भाषा में संकल्प लिया जा सकता है।

4. श्रीगणेश का पूजन

प्रत्येक शुभ कार्य का आरंभ श्रीगणेश के स्मरण से होता है। गणपति को अक्षत, पुष्प और रोली अर्पित करें।

उनसे प्रार्थना करें कि नौ दिन का पूजन निर्विघ्न संपन्न हो।

5. नवरात्रि में जौ बोने की विधि

चौकी के समीप स्वच्छ स्थान पर मिट्टी का पात्र रखें। पहले उसमें मिट्टी की एक परत बिछाएँ, फिर उस पर जौ फैलाएँ।

इसके ऊपर मिट्टी की दूसरी परत डालें और उस पर पुनः जौ डालें। अंत में हल्की मिट्टी डालकर जल छिड़कें। मिट्टी आर्द्र रहे, पर जल भर न जाए।

जौ को अन्न और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि सृष्टि की प्रथम फसल जौ ही थी।

6. कलश को सज्जित करना

कलश के कंठ पर मौली बाँधें। रोली अथवा हल्दी से उस पर स्वस्तिक बनाएँ।

कलश में स्वच्छ जल भरें और उसमें थोड़ा गंगाजल मिलाएँ। फिर सुपारी, एक मुद्रा, अक्षत और दूर्वा डालें। जिनकी परंपरा में पंचरत्न और सर्वौषधि का विधान है, वे उन्हें भी डालें।

7. पल्लव और नारियल की स्थापना

कलश के मुख पर आम के पाँच अथवा सात पल्लव लगाएँ। उन पर ढक्कन अथवा मिट्टी का छोटा पात्र रखें और उसमें अक्षत भर दें।

अब जटा वाले नारियल को लाल वस्त्र अथवा चुनरी में लपेटकर मौली बाँधें। उसे कलश के ऊपर स्थापित करें।

नारियल का मुख साधक की ओर रखने की परंपरा है। आपके कुल की रीति भिन्न हो, तो उसी का पालन करें।

8. कलश की स्थापना और आवाहन

अब कलश को जौ वाले पात्र के मध्य में स्थापित करें। स्थापना करते समय वरुण देव, समस्त देवी-देवताओं तथा पवित्र नदियों और तीर्थों का स्मरण करें।

भाव यह रहे कि सभी देवशक्तियाँ इस कलश में विराजमान हों। स्थापना के पश्चात कलश को हिलाएँ नहीं।

9. माँ दुर्गा का पूजन

यहाँ से नवरात्रि पूजा विधि का मुख्य भाग आरंभ होता है। कलश के समीप माँ दुर्गा का आवाहन करें।

प्रतिमा अथवा चित्र को अक्षत, रोली, पुष्प और वस्त्र अर्पित करें। धूप-दीप दिखाएँ और नैवेद्य चढ़ाएँ।

परिवार की श्रद्धा के अनुसार दुर्गा सप्तशती का पाठ अथवा माता की स्तुति करें। अंत में आरती करके प्रसाद वितरित करें।

10. अखंड दीप

जिनके यहाँ अखंड ज्योति की परंपरा है, वे कलश के समीप घी अथवा तेल का दीपक प्रज्वलित करें। वह नौ दिन तक जलता रहना चाहिए।

दीपक को तेज वायु से सुरक्षित स्थान पर रखें। यदि अखंड दीप संभव न हो, तो प्रातः और संध्या को दीप जलाएँ।

मंत्रोच्चारण के संबंध में

कलश स्थापना में अलग-अलग परंपराओं के अलग-अलग मंत्र प्रचलित हैं। शुद्ध उच्चारण के लिए किसी विद्वान पंडित अथवा कुलपुरोहित से मार्गदर्शन लें।

उच्चारण में संशय हो, तो भावपूर्वक माँ का नाम-स्मरण करना भी उत्तम है। पूजन में श्रद्धा ही सबसे महत्वपूर्ण है।

कलश स्थापना के नियम और सावधानियाँ

  • कलश की स्थापना ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में करें।
  • स्थान स्वच्छ, शांत और पवित्र हो। शौचालय अथवा जूते रखने के स्थान के निकट पूजा-स्थान न बनाएँ।
  • टूटा-फूटा कलश अथवा खंडित नारियल प्रयोग न करें।
  • लोहे का कलश प्रायः वर्जित माना जाता है।
  • स्थापना के पश्चात कलश को इधर-उधर न हिलाएँ।
  • स्नान किए बिना कलश और जौ को स्पर्श न करें।
  • मान्यता है कि नौ दिन घर को पूर्णतः रिक्त न छोड़ें। परिवार का कोई सदस्य उपस्थित रहे।
  • इन दिनों सात्त्विक आहार, संयम और शुद्ध आचरण का पालन करें।

नौ दिन कलश की देखभाल कैसे करें

प्रातःकाल और संध्या को कलश के समक्ष दीप जलाएँ और आरती करें। प्रतिदिन नवीन पुष्प अर्पित करें।

जौ पर प्रतिदिन थोड़ा जल छिड़कें। जल अधिक हो जाए, तो जौ गल सकते हैं।

जौ के पात्र को तीव्र धूप और तेज वायु से बचाएँ। हल्के प्रकाश वाले स्थान पर रखें। हरे-भरे अंकुर शुभ माने जाते हैं।

नवरात्रि के पश्चात कलश और जौ का विसर्जन

नवमी के पूजन के उपरांत अथवा परंपरा के अनुसार दशमी को कलश का विसर्जन किया जाता है। पहले माँ की आरती करें और पूजन में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा-प्रार्थना करें।

कलश के जल को घर के प्रत्येक कक्ष में छिड़कें। शेष जल किसी पौधे में अर्पित कर दें।

जौ के अंकुरों को प्रसाद रूप में परिवारजनों में बाँटें। कुछ अंकुर पूजा-स्थान में रखें। शेष को किसी वृक्ष की जड़ में अथवा बहते जल में विसर्जित करें।

नारियल प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। आम के पल्लव और मौली को पीपल के नीचे रखें अथवा जल में प्रवाहित करें।

FAQs

क्या रात्रि में कलश स्थापना की जा सकती है?

शास्त्रीय मान्यता के अनुसार रात्रि में कलश स्थापना वर्जित है। प्रतिपदा के दिन प्रातःकाल अथवा अभिजित मुहूर्त में स्थापना करें। यदि किसी योग की बाधा हो, तो स्थानीय पंचांग या पंडित से परामर्श लें।

कलश किस धातु का होना चाहिए?

मिट्टी, तांबे, पीतल, चाँदी अथवा स्वर्ण का कलश शुभ माना जाता है। लोहे का कलश प्रायः वर्जित माना जाता है।

क्या कलश में केवल गंगाजल भरना आवश्यक है?

नहीं। स्वच्छ जल भरकर उसमें थोड़ा गंगाजल मिला देना पर्याप्त है। गंगाजल उपलब्ध न हो, तो स्वच्छ जल से भी पूजन किया जा सकता है। यहाँ श्रद्धा ही मुख्य है।

यदि जौ न उगें अथवा विलंब से उगें, तो क्या करें?

चिंता न करें। अंकुरण मिट्टी की आर्द्रता, ऋतु के तापमान और स्थान पर निर्भर करता है। जल न अधिक डालें, न अल्प। पात्र को हल्के प्रकाश में रखें और नियमपूर्वक पूजन करते रहें।

RN Tripathy

लेखक परिचय – [रुद्रनारायण त्रिपाठी] मैं एक संस्कृत प्रेमी और भक्तिपूर्ण लेखन में रुचि रखने वाला ब्लॉग लेखक हूँ। AdyaSanskrit.com के माध्यम से मैं संस्कृत भाषा, न्याय दर्शन, भक्ति, पुराण, वेद, उपनिषद और भारतीय परंपराओं से जुड़े विषयों पर लेख साझा करता हूँ, ताकि लोग हमारे प्राचीन ज्ञान और संस्कृति से प्रेरणा ले सकें।

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