अर्गला स्तोत्रम् – संपूर्ण पाठ, हिन्दी अर्थ एवं महत्त्व
माँ दुर्गा की उपासना में अर्गला स्तोत्रम् का विशेष स्थान है। यह स्तोत्र भक्त और जगदम्बा के मध्य श्रद्धा, विश्वास तथा समर्पण का भाव दृढ़ करता है। इसमें माँ चण्डिका के विविध स्वरूपों की स्तुति करते हुए उनसे विजय, यश, आरोग्य, सौभाग्य और सुख की प्रार्थना की गई है।
अर्गला स्तोत्रम् दुर्गा सप्तशती के पाठ से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण स्तोत्र है। नवरात्रि, दुर्गा पूजा तथा अन्य देवी उपासना के अवसरों पर अनेक भक्त इसका पाठ करते हैं। इसके प्रत्येक श्लोक में माँ भगवती की महिमा के साथ जीवन को सुखमय और मंगलमय बनाने की प्रार्थना निहित है।
अर्गला स्तोत्रम् क्या है?
अर्गला स्तोत्रम् माँ चण्डिका को समर्पित एक संस्कृत स्तोत्र है। इसका संबंध श्री दुर्गा सप्तशती अर्थात् देवी माहात्म्य की उपासना परंपरा से है। परंपरागत रूप से इसे दुर्गा सप्तशती के पाठ से पूर्व पढ़े जाने वाले स्तोत्रों में सम्मिलित किया जाता है।
‘अर्गला’ शब्द का सामान्य अर्थ द्वार की अड़चन अथवा द्वार बंद करने वाली छड़ होता है। आध्यात्मिक भाव से इसे देवी की कृपा प्राप्त करने के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना के रूप में समझा जाता है।
इस स्तोत्र की विशेषता इसकी बार-बार दोहराई जाने वाली प्रार्थना है—
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि।
इसमें भक्त माँ भगवती से सुंदर स्वरूप, विजय, यश और शत्रुओं के नाश की प्रार्थना करता है। यहाँ शत्रुओं का भाव बाहरी विरोधियों के साथ जीवन की बाधाओं और प्रतिकूल परिस्थितियों से भी जोड़ा जा सकता है।
अर्गला स्तोत्रम् का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व
अर्गला स्तोत्रम् केवल देवी की स्तुति नहीं, बल्कि अपने जीवन को माँ भगवती के चरणों में समर्पित करने की प्रार्थना भी है। इसके श्लोकों में भक्त अपनी विभिन्न कामनाएँ माँ के सामने रखता है।
इसमें माँ दुर्गा को दुष्टों का नाश करने वाली, भक्तों को सुख देने वाली, आरोग्य प्रदान करने वाली और कल्याण करने वाली देवी के रूप में नमन किया गया है।
1. माँ भगवती के विविध स्वरूपों की स्तुति
स्तोत्र के प्रारम्भ में माँ को जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा और धात्री आदि नामों से संबोधित किया गया है।
ये नाम देवी की विभिन्न शक्तियों और गुणों का स्मरण कराते हैं। भक्त इन नामों के माध्यम से माँ के मंगलकारी, रक्षक और कल्याणकारी स्वरूप की वंदना करता है।
2. विजय, यश और सौभाग्य की प्रार्थना
अर्गला स्तोत्रम् में बार-बार विजय और यश की कामना की गई है। भक्त माँ से जीवन में आने वाली कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने तथा सम्मानपूर्ण जीवन जीने की प्रार्थना करता है।
यह प्रार्थना व्यक्ति को अपने उद्देश्य के प्रति दृढ़ रहने और माँ भगवती के प्रति विश्वास बनाए रखने की प्रेरणा देती है।
3. आरोग्य, सुख और समृद्धि की कामना
इस स्तोत्र में केवल विजय ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, सौभाग्य, परम सुख और ऐश्वर्य की भी प्रार्थना की गई है।
भक्त माँ से ऐसी कृपा की याचना करता है, जिससे उसका जीवन सुखमय हो तथा परिवार में मंगल और समृद्धि बनी रहे।
4. विद्या, यश और लक्ष्मी की प्राप्ति
अर्गला स्तोत्रम् में माँ से भक्त को विद्यावान, यशस्वी और लक्ष्मीवान बनाने की प्रार्थना की गई है।
यह भाव दर्शाता है कि देवी उपासना में ज्ञान, सदाचार, सम्मान और समृद्धि को भी महत्त्वपूर्ण माना गया है।
अर्गला स्तोत्रम् का संपूर्ण संस्कृत पाठ
नीचे अर्गला स्तोत्रम् का संपूर्ण पाठ दिया गया है। इसमें आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए मूल संस्कृत पाठ को यथावत् रखा गया है।
॥ अथार्गलास्तोत्रम् ॥
ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः॥
ॐ नमश्चण्डिकायै॥
मार्कण्डेय उवाच
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥१॥
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥२॥
मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥३॥
महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥४॥
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥५॥
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥६॥
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥७॥
अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥८॥
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥९॥
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१०॥
चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥११॥
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१२॥
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१३॥
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१४॥
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१५॥
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१६॥
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१७॥
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१८॥
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥१९॥
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२०॥
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२१॥
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२२॥
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥२३॥
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥२४॥
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशतीसङ्ख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥२५॥
॥ इति देव्या अर्गलास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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अर्गला स्तोत्रम् का हिन्दी अर्थ एवं भावार्थ
अर्गला स्तोत्रम् के प्रत्येक श्लोक में माँ भगवती के किसी विशेष गुण, स्वरूप अथवा कृपा का वर्णन किया गया है। नीचे इसके प्रमुख श्लोकों का सरल हिन्दी भावार्थ दिया गया है, जिससे पाठ करते समय भक्त उसके भाव को भी समझ सके।
प्रारम्भिक प्रार्थना का अर्थ
ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य…
इस विनियोग में भगवान विष्णु को ऋषि, अनुष्टुप् छन्द को छन्द तथा श्रीमहालक्ष्मी को अधिष्ठात्री देवी बताया गया है। यह स्तोत्र श्रीजगदम्बा की प्रसन्नता के लिए दुर्गा सप्तशती के पाठ के अंग के रूप में किया जाता है।
ॐ नमश्चण्डिकायै॥
अर्थात् माँ चण्डिका को मेरा नमस्कार है। यह वंदना देवी के प्रति श्रद्धा और समर्पण का भाव प्रकट करती है।
प्रथम एवं द्वितीय श्लोक का अर्थ
प्रथम श्लोक में माँ को जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा और धात्री आदि नामों से प्रणाम किया गया है।
इन नामों के माध्यम से भक्त माँ के मंगलकारी, रक्षक, क्षमाशील और कल्याणकारी स्वरूप की स्तुति करता है। वह माँ के प्रत्येक स्वरूप में दिव्य शक्ति का दर्शन करता है।
द्वितीय श्लोक में माँ चामुण्डा को समस्त पीड़ाओं का हरण करने वाली, सर्वत्र व्याप्त और कालरात्रि स्वरूपा कहकर उनकी जय-जयकार की गई है।
इसमें भक्त माँ से अपनी रक्षा करने तथा जीवन की पीड़ाओं को दूर करने की प्रार्थना करता है।
तृतीय से षष्ठ श्लोक का अर्थ
इन श्लोकों में माँ भगवती की उन दिव्य शक्तियों का वर्णन है, जिनके द्वारा उन्होंने मधु-कैटभ, महिषासुर, रक्तबीज, चण्ड-मुण्ड, शुम्भ-निशुम्भ और धूम्राक्ष जैसे दैत्यों का संहार किया।
भक्त माँ के इसी पराक्रमी स्वरूप का स्मरण करते हुए उनसे विजय, यश और शत्रुओं के नाश की प्रार्थना करता है।
इन श्लोकों का आध्यात्मिक भाव यह है कि माँ की कृपा से व्यक्ति अपने जीवन की कठिनाइयों और प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने का साहस प्राप्त करे।
सप्तम से एकादश श्लोक का अर्थ
इन श्लोकों में माँ के चरणों की वंदना, उनके अचिन्त्य स्वरूप और भक्तों पर उनकी कृपा का वर्णन किया गया है।
माँ चण्डिका को समस्त सौभाग्य प्रदान करने वाली, पाप और कष्ट दूर करने वाली तथा रोगों का नाश करने वाली देवी कहकर प्रणाम किया गया है।
इन श्लोकों में भक्त माँ से प्रार्थना करता है कि वे उसके जीवन के कष्टों को दूर करें और उसे सुख, शान्ति तथा कल्याण प्रदान करें।
द्वादश से षोडश श्लोक का अर्थ
इन श्लोकों में भक्त माँ से सौभाग्य, आरोग्य, परम सुख, शक्ति, कल्याण और परम समृद्धि की याचना करता है।
विशेष रूप से षोडश श्लोक में माँ से प्रार्थना की गई है कि वे भक्त को विद्यावान, यशस्वी और लक्ष्मीवान बनाएँ।
यहाँ विद्या, यश और लक्ष्मी को जीवन के महत्त्वपूर्ण ऐश्वर्यों के रूप में देखा गया है। भक्त माँ से केवल भौतिक सुख ही नहीं, बल्कि ज्ञान और सम्मान से युक्त जीवन की भी कामना करता है।
सप्तदश से त्रयोविंश श्लोक का अर्थ
इन श्लोकों में माँ चण्डिका के पराक्रम, उनकी दिव्य महिमा और भक्तों को आनन्द प्रदान करने वाले स्वरूप की स्तुति की गई है।
माँ को दैत्यों के अभिमान का नाश करने वाली तथा भक्तों को आनन्द देने वाली अम्बिका कहा गया है।
इन श्लोकों में भगवान कृष्ण, हिमाचलसुता के स्वामी अर्थात् भगवान शिव तथा इन्द्र द्वारा देवी की स्तुति और पूजा का भी उल्लेख मिलता है।
भक्त इन दिव्य प्रसंगों का स्मरण करके माँ की महिमा को नमन करता है और उनसे विजय, यश तथा कल्याण की प्रार्थना करता है।
चतुर्विंश श्लोक का अर्थ
इस श्लोक में भक्त माँ से अपने मन के अनुकूल, मनोरम और सद्गुणों से युक्त पत्नी प्रदान करने की प्रार्थना करता है।
साथ ही ऐसी जीवनसंगिनी की कामना करता है, जो कठिन संसार-सागर से पार उतरने में सहायक हो तथा कुल की मर्यादा के अनुकूल हो।
इस श्लोक में गृहस्थ जीवन के सुख, पारिवारिक सामंजस्य और जीवनसाथी के महत्त्व को प्रकट किया गया है।
पञ्चविंश श्लोक का अर्थ
अंतिम श्लोक में कहा गया है कि जो मनुष्य इस अर्गला स्तोत्र का पाठ करने के पश्चात् महास्तोत्र अर्थात् दुर्गा सप्तशती का पाठ करता है, वह श्रेष्ठ वरों और सम्पदाओं को प्राप्त करता है।
यह श्लोक अर्गला स्तोत्र के पाठ को दुर्गा सप्तशती की उपासना से जोड़ता है तथा देवी की कृपा प्राप्त करने की भावना को प्रकट करता है।
अर्गला स्तोत्रम् की प्रमुख प्रार्थना का अर्थ
अर्गला स्तोत्रम् में बार-बार आने वाली प्रार्थना इसके मूल भाव को प्रकट करती है।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
इसका सरल हिन्दी अर्थ है—
- रूपं देहि — हे माँ! मुझे सुंदर एवं शुभ स्वरूप प्रदान करें।
- जयं देहि — मुझे विजय प्रदान करें।
- यशो देहि — मुझे यश और सम्मान प्रदान करें।
- द्विषो जहि — मेरे शत्रुओं का नाश करें।
यहाँ रूप का अर्थ केवल बाहरी सौन्दर्य तक सीमित नहीं है। इसे व्यक्तित्व की शोभा, सद्गुणों और शुभता के भाव से भी समझा जा सकता है।
इसी प्रकार विजय का भाव जीवन की कठिनाइयों पर सफलता प्राप्त करने से भी जुड़ा है। भक्त इस प्रार्थना के माध्यम से माँ से अपने जीवन को मंगलमय बनाने की कृपा माँगता है।
अर्गला स्तोत्रम् पाठ करने की विधि
अर्गला स्तोत्रम् का पाठ श्रद्धा और एकाग्रता के साथ करना चाहिए। दुर्गा सप्तशती के पाठ में इसे परंपरागत रूप से देवी कवच के पश्चात् तथा कीलक स्तोत्र से पूर्व पढ़ा जाता है।
1. पूजा स्थल की स्वच्छता
सर्वप्रथम पूजा स्थल को स्वच्छ करें। माँ दुर्गा अथवा माँ चण्डिका के चित्र या प्रतिमा के समक्ष बैठकर उपासना की तैयारी करें।
2. माँ भगवती का स्मरण
हाथ जोड़कर माँ भगवती को प्रणाम करें। मन को शांत रखते हुए श्रद्धापूर्वक देवी का स्मरण करें।
3. अर्गला स्तोत्रम् का पाठ
इसके पश्चात् अर्गला स्तोत्रम् का संपूर्ण पाठ करें। प्रत्येक श्लोक का स्पष्ट उच्चारण करने का प्रयास करें। पाठ करते समय उसके अर्थ और भाव पर भी ध्यान दें।
4. दुर्गा सप्तशती के साथ पाठ
यदि आप दुर्गा सप्तशती का संपूर्ण पाठ कर रहे हैं, तो अपनी पारिवारिक अथवा गुरु-परंपरा के अनुसार देवी कवच, अर्गला स्तोत्रम् और कीलक स्तोत्र का पाठ करें। इसके पश्चात् सप्तशती के मुख्य पाठ को आगे बढ़ाएँ।
5. श्रद्धापूर्वक प्रार्थना
पाठ पूर्ण होने पर माँ भगवती के चरणों में प्रणाम करें। अपने परिवार के सुख, आरोग्य, कल्याण और आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रार्थना करें।
अर्गला स्तोत्रम् पाठ करने के लाभ
अर्गला स्तोत्रम् में माँ भगवती से अनेक प्रकार की कृपा प्राप्त करने की प्रार्थना की गई है। भक्त इस स्तोत्र का पाठ देवी के प्रति श्रद्धा और विश्वास के साथ करते हैं।
इसके पाठ से जुड़े प्रमुख आध्यात्मिक भाव निम्नलिखित हैं—
- मानसिक साहस एवं आत्मविश्वास: माँ के पराक्रमी स्वरूप का स्मरण व्यक्ति को कठिनाइयों का सामना करने की प्रेरणा देता है।
- सौभाग्य एवं कल्याण की कामना: स्तोत्र में माँ से सौभाग्य, सुख और मंगल की प्रार्थना की गई है।
- आरोग्य एवं सुख की प्रार्थना: भक्त माँ से अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य तथा सुखमय जीवन की कामना करता है।
- विद्या एवं यश की प्राप्ति की कामना: इस स्तोत्र में माँ से विद्यावान, यशस्वी और लक्ष्मीवान बनाने की प्रार्थना की गई है।
- भक्ति एवं आत्मिक शान्ति: श्रद्धापूर्वक पाठ करने से भक्त का ध्यान देवी की उपासना में केंद्रित होता है तथा मन में भक्ति का भाव दृढ़ होता है।
ये लाभ स्तोत्र में व्यक्त प्रार्थनाओं और भक्तिपरक मान्यताओं से जुड़े हैं। इन्हें किसी निश्चित भौतिक परिणाम अथवा रोग के उपचार की गारंटी नहीं समझना चाहिए।
अर्गला स्तोत्रम् का पाठ कब करना चाहिए?
अर्गला स्तोत्रम् का पाठ नवरात्रि, दुर्गा पूजा तथा अन्य देवी उपासना के अवसरों पर किया जा सकता है। विशेष रूप से दुर्गा सप्तशती के पाठ के समय इसका महत्त्व माना जाता है।
भक्त अपनी श्रद्धा और पूजा-परंपरा के अनुसार नियमित रूप से भी इसका पाठ कर सकते हैं। इसके लिए किसी एक विशेष दिन तक सीमित रहना आवश्यक नहीं है।
नवरात्रि में माँ दुर्गा की आराधना के साथ अर्गला स्तोत्रम् का पाठ करना भक्तों के लिए देवी के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण करने का एक माध्यम है।
अर्गला स्तोत्रम् से जुड़े सामान्य प्रश्न (FAQs)
1. अर्गला स्तोत्रम् क्या है?
अर्गला स्तोत्रम् माँ चण्डिका को समर्पित एक संस्कृत स्तोत्र है। यह दुर्गा सप्तशती की उपासना परंपरा से जुड़ा है और इसमें माँ भगवती से विजय, यश, आरोग्य, सौभाग्य तथा कल्याण की प्रार्थना की गई है।
2. अर्गला स्तोत्रम् का पाठ कब करना चाहिए?
अर्गला स्तोत्रम् का पाठ नवरात्रि, दुर्गा पूजा तथा अन्य देवी उपासना के अवसरों पर किया जा सकता है। दुर्गा सप्तशती के पाठ में इसे देवी कवच के पश्चात् तथा कीलक स्तोत्र से पूर्व पढ़ने की परंपरा है।
3. अर्गला स्तोत्रम् में ‘रूपं देहि जयं देहि’ का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है—हे माँ! मुझे सुंदर एवं शुभ स्वरूप प्रदान करें, विजय दें, यश प्रदान करें और मेरे शत्रुओं का नाश करें। यह प्रार्थना जीवन में शुभता, सफलता और बाधाओं से मुक्ति की कामना व्यक्त करती है।
4. क्या अर्गला स्तोत्रम् का पाठ दुर्गा सप्तशती के बिना कर सकते हैं?
हाँ, भक्त अर्गला स्तोत्रम् का स्वतंत्र रूप से भी पाठ कर सकते हैं। यह माँ चण्डिका की स्तुति और प्रार्थना का स्तोत्र है। हालाँकि, दुर्गा सप्तशती के संपूर्ण पाठ में इसे अपनी पूजा-परंपरा के अनुसार पढ़ा जाता है।














